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श्रीराम और महादेव का युद्ध ! Rama Vs Mahadeva Battle

(Shrirama Vs Mahadeva Battle) रामायण की कथा के बारे में शायद ही कोई नहीं जानता होगा. प्रभु श्रीरामने धर्म की स्थापना के लिए राक्षसराज रावन किया था और धर्म का राज्य फिरसे प्रस्थापित किया था. पर क्या आप ये जानते हे की एकबार भगवान श्रीराम को अपनेही आराध्य भगवान महादेव से युद्ध करना पड़ा था ???

कहा जाता हे कि ये युद्ध(Rama Vs Mahadeva) त्रेतायुग का सबसे प्रलयंकारी और महाभयानक युद्ध था. बात तब की हे, जब भगवान श्रीराम रावन का वध कर अयोध्या के सिंहासन पर बैठे थे, तब पुरे संसार में धर्म की प्रतिस्थापना हेतु प्रभु राम अश्वमेध यज्ञ का आयोजन करते हे.

अश्वमेध यज्ञ के नियमो के अनुसार इस यज्ञ का अश्व जिस-किसी राज्य में जाता हे उस राज्य के राजा को या तोह यज्ञपती की अधीनता स्वीकार करनी पड़ती थी या फिर उस अश्व को पकड़कर उस चुनोती यांनी युद्ध करणा पडता था. इसीकरण इस यज्ञ का सफल होना यानी पूरी पृथ्वी पर अधिपत्य करने सामान होता था.

प्रभू श्रीराम(Lord Rama) के यज्ञ के अश्व के साथ की अयोध्या की इस सेना थी और इस सेना का नेतृत्व भगवान श्रीराम के भाई शत्रुघ्न कर रहे थे. साथ में हनुमान, सुग्रीव तथा लक्ष्मणपुत्र पुष्कल जैसे महान वीर भी उपस्थित थे.

ज्यादातर राजाओं ने तो अयोध्या की अधीनता स्वीकार कर ली, तो कई राजाओं ने चुनोती भी दी… पर अयोध्या की सेना के आगे उन्हें भी अश्व को छोड़ना पड़ा.

रास्ते में देवपुर नाम का राज्य आया, जो महान शिवभक्त राजा विरमनी का राज्य था जिनकी सेना का प्रमुख उनके दो पुत्र रुपमंगद और शुभाम्गद.. जो अपनी पिता की भाती काफी शुर और पराक्रमी थे. तथा विरमनी का भाई वीरसिंह भी एक महारथी था.

राजा विरमानी भगवन शिव के असीम भक्त थे, तथा उन्होंने भगवान् रूद्र की कठोर तपस्या कर उन्हें प्रसन्न किया था. और महादेव(Mahadev) से उनके राज्य की रक्षा का वचन प्राप्त कर लिया था.

जब यज्ञ का अश्व देवपुर नामके राज्य पुहचा, तो रुपमान्गद ने अश्व को पकड़ लिया. और अश्व के रक्षको को चुनोती दी की…
“अपने सेनानायक से कहो अश्व देवपुर के युवराज के पास हे, और यदी उन्हे वो चाहिये तो आकार देवपूर से युद्ध करे”

जब राजा विरमनी को ये बात पता चली कि उनके पुत्र ने भगवान श्रीराम कि सेना को चुतौती दि हे तो उन्हें दुःख हुवा पर क्षत्रिय धर्म के पालन करने हेतु उन्होंने सेना को तैयार करने का आदेश दिया.

अब अयोध्या की सेना देवपुर की सेना के सामने थी. दोनों सेनाओ में भयानक युद्ध शुरू होगया, भरतपुत्र पुष्कल राजा विरमानी से भीड़ गये… हनुमान वीरसिंह से तो सुग्रीव और शत्रुघ्न रुपमंगद और शुभंगाद से युद्ध करने लगे.

अयोध्या के पराक्रमी वीरो से भारी सेनाने देवपुर की सेना को पीछे हटने के लिए मजबूर कर दिया, साथ ही भरतपुत्र पुष्कल ने अपने पराक्रमसे राजा विरमानी को घायल कर दिया था.

Shrirama Vs Mahadeva Battle

अपनी होती हार को देख राजा विरमनी ने भगवान् महादेव का आवाहन किया.
अपने भक्त कि आवाज सून महादेव ने तुरंत वीरभद्र, नंदी, भृंगी सहित अपने सारे गणों को युद्ध में भेज दिया.
स्वयं महादेव के गनों को देखकर युद्धभूमि में हाहाकार मच गया… और पेहले से और भयंकर युद्ध शुरू हुवा.
अब पुष्कल वीरभद्र से …
हनुमान नंदी से तो
शत्रुघ्न भृंगी से लड़ने लगे.

पुष्कल ने अपने सारे अस्र और दिव्यस्रो का प्रयोग वीरभद्रपर कर दिया पर वीरभद्र ने सारे अस्रो को तोड़ दिया, अंत मे वीरभद्र ने पुष्कल को समझाया कि वो युद्ध से पीछे हटे पर पुष्कळ इसके लिए तैयार नहीं हुवा.
तब वीरभद्र ने पुष्कल पर त्रिशूल से वार किया, पराक्रमी पुष्कल ये वार सहन न कर सका, और उसकी मृत्यू हो गयी.

उधर भृंगी ने शत्रुघ्न और सुग्रीव को नागपाश से बांध दिया. हनुमान और नंदी में भयानक युद्ध चल रहा था… और कोई भी हारने के लिए तैयार नहीं था.

अयोध्या की होती हार देख सुग्रीव और शत्रुघ्न सहित सारी सेना प्रभु श्रीराम का आवाहन करने लगी. अपने भक्तो की पुकार सुनकर भगवान राम लक्ष्मण सहित युद्धभूमि पर अवतरित हुए.
उन्होंने सुग्रीव और शत्रुघ्न को मुक्त कर दिया. पर पुष्कल के मृत शरीर को देख वे बड़े ही क्रोधित हुए.

और उन्होने वीरभद्र और शिवगणों पर हमला बोल दिया, प्रभु श्रीराम के भयानक हमले से वीरभद्र सहित सभी गणों ने महादेव की आराधना शुरू कर दी.

ये देख महादेव भी युद्धक्षेत्र में प्रगट हो गए. पर अपने अराध्य को देख प्रभु श्रीराम ने शस्त्र का त्याग कर उन्होंने महादेव की स्तुति शुरू कर दी. और कहा ” भगवंत, आपही की कृपा के कारन में महाबली रावन को मार पाया, मेरा या मेरी सेना का बल तो आपही से.. अत: कृपा कर इस युद्ध को यही रोक दे”

तब महादेव ने प्रभु राम से कहा “आप संकोच छोड़कर अपने क्षात्रधर्म का पालन करे” प्रभु श्रीराम ने इस आज्ञा को मानते हुए युद्ध आरंभ कर दिया. दोनों ही मनतम अस्रो से एकदुसरे पर आघात करने लगे, दोनों में प्रलयकारी युद्ध छिड़ गया और तीनो लोको में हाहाकार मच गया. जब प्रभु श्रीरामके सारे अस्र ख़त्म होगये तब प्रभु श्रीरामने भगवान् शिव सेही प्राप्त किये पाशुपतअस्र का संधान भगवान् महादेव पर किया.

संधान किया हुवा अस्र सीधा भगवान महादेव के हृदय में समां गया. तब प्रसन्न हुए महादेव श्रीराम से बोले “हे श्रीराम आपने मुझे युद्ध में संतुष्ट किया हे, इसीलिए जो इच्छा हो मांग लो” भगवान् श्रीराम ने कहा “भगवन इस युद्ध में भरतपुत्र पुष्कल सहित लाखो वीर मारे गये हे, तथा इन सभी वीरो के प्राण लौटा दो” तब महादेव ने तथास्तु कहकर सभी को जीवनदान दे दिया.

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