Prataprao Gujar and Battle Of Salher [HIndi]

साल्हेर किले कि लडाई और प्रतापराव गुजर

तराई के दुसरे युद्ध के बाद भारत मे बाहरी(मुस्लीम) राजकर्ताओ ने अपनी सत्ता की शुरवात की थी | इसके बाद खुले मैदानमें लड़ी गयी ज्यादातर लड़ाईयो स्थानिक राजा हारे गए | पर समय हर वक्त एकजैसा नही होता…! साल था १६७२, महाराष्ट्र मे छत्रपती शिवाजी नाम के शेर ने मुघलो से लोहा लिया था | पर अबतक शिवाजी महाराजने मुघलो को खुले मैदान मे नही रौंदा | शिवाजी महाराज ने अबतक की लड़ाईया “गनिमी कावा” या आज की भाषा में कहे तो Guerilla Warfare से लड़ी थी | पर अब वक्त बदलने वाला था… काल का चक्र अब उल्टा फिरने वाला था …!! ४०० साल बाद महाराष्ट्र के नासिक के नजदीक एक ऐसा युद्ध हुवा जिसमे छोटीसी मराठा सेनाने अपने से दुगने मुघलो को खुले में हुई लड़ाई में रौंद दिया… आज के लेख में हम बात करेंगे साल्हेर किले (Salher Fort) की लड़ाई और महान वीर प्रतापराव गुजर (Prataprao Gujar) के बारे में. !

Prataprao Gujar

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पुरंदर की संधि और आग्रा से वापसी

मिर्ज़ाराजे जयसिंग और दिलेर खान से हुए पुरंदर के युद्ध और उसके बाद हुई पुरंधर की संधि के कारन शिवाजी महाराज को अपने अनेको किले मुघलो को देने पड़े थे | औरंगजेबने महाराज को आग्रा भी बुलाया था | पर आगरा में बुलाकर तो औरंगजेबने शिवाजी महाराज को कैद करने की योजना ही बना रख्खी थी | छत्रपति शिवाजी महाराज (Shivaji Maharaj) आग्रा से सफलतापूर्वक वापस निकल आये |
महाराष्ट्र में आते ही शिवाजी महाराज ने अपने किलो को वापस लेने की मुहीम चला दी | अगले दो सालो में मुघलोसे लगभग सारे किले वापस ले लिए गए |
Murarbaji (Battle Of Purandar)


साल्हेर और मुल्हेर किले (Salher Fort and Prataprao Gujar)

नासिक में दो किले हे, साल्हेर और मुल्हेर…! ये एक रणनीति की दृष्टी से काफी महत्वपूर्ण स्थान पर स्थित हे | पुरंदर की संधि के कारन मुघलो के पास गए इन किलो मेसे साल्हेर को का वापस हिन्दवी स्वराज्य में शामिल करने में सेनापती प्रतापराव गुजर और मंत्री मोरापंत पिंगले सबसे आगे थे | प्रतापराव गुजर और मोरोपंत इन दोनों ने पुरंदर की संधिसे मुघलो को दिए अनेको किलो को फिर हिन्दवी स्वराज में मिलाया था….इनमे साल्हेर भी शामिल था |
साल्हेर को जाता देख औरंगजेब गुस्से से लाल होगया | उसने एक बड़ी फ़ौज और शक्तिशाली तोपखाने के साथ बहलोल खान और इकलास खान को साल्हेर किले को जितने के लिए भेज दिया |
कुछ ही दोनों बाद ५० हजारसे भी बड़ी मुग़ल फ़ौज ने साल्हेर को घेर रख्खा था | साल्हेर मुघलो की सांसो को महसूस कर सकता था |
Salher Fort and Mulher Foty Topography
 

प्रतापराव गुजर की रणनीती (Prataprao Gujar and Battle Of Salher)

मराठा सेना के सेनापति प्रतापराव गुजर(Prataprao Gujar) हार माननेवालो मेसे नही थे | उन्होंने एक रणनीतिक चाल चली, मराठोके दो गुट बनाये… एक का नेतृत्व खुद सेनापति प्रतापराव गुजर कर रहे थे तो दुसरे का पेशवा मोरोपंत पिंगले | प्रतापरावने उत्तर दिशा से साल्हेर को घेर के बैठी मुग़लसेना पर आक्रमण किया, और मुघलो के बेड़े को तोड़ दिया | घनघोर लड़ाई शुरू थी, ५० हजार सेना के आगे प्रतापराव की १० हजारसे भी कम सेना थी…| मराठे जी जानसे लड़ रहे थे, प्रतापराव ने जैसे महाकाल का रूप ले लिया था | पर फिर भी अपनी महाकाय सेना के बलुबुते पर इकलास खान उन्हें पीछे धकेल रहा था…| मुघलो की जित लगभग पक्की हो चुकी थी |
 
पर तभी अचानक !! मोरोपंत पिंगले (Moropant Pingle) के नेतृत्व में कोंकणसे आनेवाले १० हजार मराठे लड़ाई में कूद गए. मराठो की ताकद दोगुना तो हौसला हजार गुना बढ़ गया…| साथ ही मुगलों का हौसला टूट गया | और फिर जो युद्ध हुवा, जिसकी किसी ने कल्पना भी न की थी…. २० हजार मराठो ने ५० हजार की सेना के छक्के छुड़ा दिए | हजारो मुग़ल काटे गए, मुघलो के महाकाय तोफखाने की मराठो की कमजोर तोफोने कमर तोड़ दी | प्रतापराव गुजर(Prataprao Gujar) ने तो पराक्रम और रणनीति की परिसीमा लांध दी थी | कोई भी मुग़ल उनके सामने आने की हिम्मत कर नही पा रहा था |
Battle Of Salher
मराठो ने चमत्कार कर दिया था…. आमने सामने की लड़ाई में अपने से लगभग तिन गुना ताकदवर सेना को उन्होंने रौंद दिया था… ६००० घोड़े और १२५ से ज्यादा हाथी पकडे गए… इखलास खान की गंभीर जखमी हुवा, बहलोल खान भी भाग खड़ा हुवा…

 

पुरंदर की लड़ाई लड़नेवाला दिलेर खान उस वक्त नासिकके पास ही था, पर प्रतापराव और मोरोपंत के पराक्रम की सूचना सुनकर वो भाग खड़ा हुवा….

कुछ दिनों के अन्दर मराठोने साल्हेर के पास वाले मुल्हेर किलेसे भी मुघलो को खदेड़ दिया | इतिहासकारको की माने तो तराई के पहले युद्ध के बाद किसी हिन्दू सेनाने खुले मैदान में इस्लामी सेना को हराया था (अपवाद विक्रमादित्य हेमू का: पर बहोतसे इतिहासकार हेमू कि सेना को आदिलशाह कि सेना मानते हे)| पर ये तो शुरवात थी, अभी संभाजी महाराज, संताजी, धनाजी और बाजीराव का वक्त आना बाकि था |
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