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जब चर्पटीनाथ ने किया इंद्र विष्णू और शिवसे युद्ध – नवनाथ भक्तिसार कथा

जब चर्पटीनाथ ने किया इंद्र विष्णू और शिवसे युद्ध – नवनाथ भक्तिसार कथा

नाथ संप्रदाय का एक व्यक्ति भारत के सबसे बड़े राज्य का मुख्यमंत्री बन गया हे. पर फिर भी बहोत सारे लोगो को आज भी नाथ संप्रदाय के बारे में पता नहीं हे. आजतक हमने आपको बहोत सी पौराणिक कथाये सुनाई हे और आज हम आपको नाथ संप्रदाय की एक कथा बताने जाने वाले हे. कथा का स्रोत नवनाथ भक्तिसार हे. नमस्कार मित्रो स्वागत हे आपका मिथक टीवी यूट्यूब चैनल की अधिकृत वेबसाइट में में.

कथा का स्रोत – नवनाथ भक्तिसार   चर्पटीनाथ की ऋषि पीपलायन का कलियुग का अवतार माना जाता हे, जो खुद भगवान कृष्ण के अवतार थे. साथ ही चर्पटीनाथ नवनाथ संप्रदाय के प्रमुख ९ नाथ मेसे एक थे. एकबार चर्पटीनाथ अपनी बाल्यावस्था में भगवान् विष्णु, भगवान् शिव और इंद्र और उनकी बड़ी सेना को अकेले ही युद्ध में पराजित किया था. बालक चर्पटीनाथ ने भगवान दत्त से नाथ संप्रदाय की दीक्षा ली थी. और उन्होंने अपनी भक्ति से भगवान् शिव को भी प्रसन्न कर लिया था. अपनी गहन लगन और आत्मशक्ति से उन्होंने १४ विद्याये, ६४ कलाए, प्राप्त कर ली थी. नाथ संप्रदाय से उन्हें शबरी विद्या का भी ज्ञान मिल गया था. शाबरी विद्या ऐसी विद्या थी जो सिर्फ और सिर्फ नाथ संप्रदाय की थे और ये विद्या नाथ संप्रदाय के आलावा किसी भी देव दैत्य यक्ष या किन्नर को हासिल नहीं थी.  

शाबरी विद्या के बारे में हम एक अलग आर्टिकल लिख कर आपको बताएँगे.

अपने अध्ययन के बाद चर्पटीनाथ लोक-कल्याण में लग गए. उनके सामाजिक कार्य के साथ उनका शिष्यसंप्रदाय भी बड़ा होने लगा.  

देवराज इंद्र द्वारा नारद का अपमान

कहानी की शुरवात तब होती हे, एकबार महर्षि नारद स्वर्गलोक देवराज इंद्र से भेट करने जाते हे. पर सत्ता में चूर देवराज इंद्रा महर्षि नारद की बात तक नहीं सुनता और साथ ही उन्हें अपमानित कर देता हे. अपमानित होकर नारदमुनी चर्पटीनाथ के पास आते हे. महर्षि नारद एक तरह से चर्पटीनाथ के गुरु थे क्योकि उन्होंने चर्पटीनाथ को अपनी भ्रमण कला सिखाया था, जिसमे क्षणों में तीनो लोको का भ्रमण करना भी शामिल था. अपने गुरु का एकतरह का अपमान देख, नाथ को क्रोध आ जाता हे.

चर्पटीनाथ कि स्वर्ग पर चढाई

चर्पटीनाथ महर्षि नारद को लेकर स्वर्ग में जाते हे. स्वर्ग में पुहचने पर वे विश्राम करने हेतु देवराज इन्द्र की वाटिका नंदनवन में रुकते हे. एक तरह से नंदनवन देवराज इंद्र का personal garden था और वहा जाने की इजाजत सिर्फ देवराज इंद्रा ही दे सकते थे. चर्पटीनाथ और नारद को वहा देख वन के रक्षको ने उनपर हमला कर दिया. तब चर्पटनाथ उन रक्षको से युद्ध करने लगते हे, युद्ध में वनरक्षक हार जाते हे और वे भागकर इंद्र को सब बता देते हे. तब इंद्र अपनी सेना को युद्ध करने के लिए भेज देता हे. इंद्र की देवसेना को चर्पटी नाथ के ऊपर युद्ध चढ़ाई करती हे. पर बालक चर्पटीनाथ देवसेना को बुरी तरह हराकर बंदी बना लेता हे. इंद्र को अब एह्साह होता हे की वो उस बालक का बाल तक बांका नहीं कर सकता.

विष्णू शिव और चर्पटीनाथ युद्ध

इंद्र हमेशा की तरह भगवान् शिव और भगवान् विष्णु की शरण में जाता हे. स्वर्ग पर किसीने आक्रमण किया हे, ये जानकार भगवान् शिव और विष्णु इंद्र को मदत का वचन देते हे. भगवान् विष्णु और उनकी नारायणी सेना तथा भगवान् शिव और उनके गन इंद्र के साथ नंदनवन की तरफ युद्ध के हेतु चल देते हे. इतनी बड़ी सेना को अपनी तरफ आता देख चर्पतिनाथ शबरी विद्या के वज्रास्र का प्रयोग कर अपने शरीर को वज्र सा अभेद्य बना लेता हे. नारायणी सेना और शिवजि के गन हजारो शस्रो से चर्पटीनाथ पर आक्रमण कर देते हे, पर वज्र सा शरीर होने के कारन उन्हें खरोच तक नहीं आती.

    तब भगवान् विष्णु सुदर्शन चक्र का उपयोग करते हे तब चर्पटी नाथ शाबरी विद्या के और एक अस्र मोहिनी अस्र का प्रयोग कर सुदर्शन चक्र को मोहित कर आसमान मेंही स्थिर कर देते हे. ये देख इंद्र ब्रम्हास्र को अपने धनुष पर चदा लेता हे, इससे पहले की वो ब्रम्हास्र चलादे चर्पटीनाथ वाताकर्षण अस्र का उपयोग कर देते हे. वाताकर्षण अस्र के कारन भगवन शिव, भगवन विष्णु और इंद्र मूर्छित होकर गिर जाते हे. ये सब देखकर ब्रम्हदेव वहा आ जाते हे, और चर्पटीनाथ से विनती करते हे की वताकर्षण अस्र को हटाकर सभी को पहले जैसा कर दे. चर्पटीनाथ अपना अस्र वापस लेते हे, तो सभी पूर्वस्थिति पर आ जाते हे. इंद्र को अपनी गलती माननी पड़ती हे और वो महर्षि नारद से क्षमा मांग लेता हे.  

हमारी पौराणिक कथाये सिर्फ कथाये नहीं हे वे दर्शनशास्र या नैतिकता के काफी पाठ पढाती हे. चाहे सत्य की और से सिर्फ एक बच्चाही क्यों न खड़ा हो और उसके खिलाफ अगर भगवान् भी हो तो अंत में विजय बच्चे कीही होगी.

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