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नारायणअस्त्र (Narayanastra) – भगवान नारायण का दैवी अस्त्र

नारायणअस्त्र (Narayanastra) – भगवान नारायण का दैवी अस्त्र! नमस्कार मित्रो, स्वागत हे आपका मिथक टीवी कि अधिकृत website में. रामायण महाभारत और प्राचीन ग्रंथो में वर्णित बहोत से पौराणिक युद्हो में काफी चमत्कारिक अस्त्रों के उपयोग के वर्णन हे. एक लेख में हमने गंधर्वअस्र के बारे में बताया था. आज हम आपको भगवान विष्णु के नारायनास्र के बारे में बताएँगे.  

नारायणअस्त्र (Narayanastra) – जिसे कोई हरा नही सकता

नारायणअस्र भगवान विष्णु का वो अस्र हे जिस का उन्होंने अपने नारायण अवतार में उपयोग किया था. ये अस्र लम्बे कालतक अनेको प्रकार के अलग-अलग शस्र और साथ ही अग्नि की वर्षा करता हे, जब भी कोई योद्धा इसका विरोध करता हे, तो इस अस्र का तेज और बढ़ जाता हे और वो पहले से ज्यादा तीव्रता से दुश्मन पर टूट पड़ता हे, इस अस्त्र की शक्ति तब तक बढ़ती रहती हे जबतक वो योद्धा या तो शरणागती ना लेले, या फिर उसकी मृत्यु ना हो जाये. नारायणअस्र के सामनेसे जिन्दा बचने का सिर्फ एक ही उपाय हे. वो ये की… इसके सामने आत्मसमर्पण कर दे, अपने शस्रो का त्याग करले ले. युद्ध के नियमो के अनुसार निहत्ये पर वार नही किया जा सकता था और इसीकारन ऐसा करने से ये अस्र शांत हो जाता हे.

महाभारत युद्ध मे अश्वत्थामा का नारायणअस्त्र (Narayanastra)

महाभारत के युद्ध के समय कुरु योद्धा अश्वथामा, जो कौरवो की और से लड़ रहा था उसने नारायणअस्र का प्रयोग पांडवसेना पर किया था. भगवान कृष्ण जो खुद भगवान् विष्णु के अवतार हे यानि भगवां नारायण हे, उन्होंने पांडवो को समझाया की अपने हथियार निचे रखकर इस अस्र को आत्मसमर्पित हो जाओ यही एक उपाय हे इस से बचने का. कुछ अभ्यासको के अनुसार ऐसा भी कहा जाता हे की नारायण अस्र का उपयोग एक युद्ध में एकही बार किया जा सकता हे, और अगर कोई योद्धा इसका उपयोग दूसरी बार करता हे. तो, वो योद्धा जो इस अस्र को चलाता हे उसी की सेना को नारायनास्र नष्ट कर देता हे.

  कुरुक्षेत्र युद्ध के दौरान जब अश्वथामा ने इस अस्र को चलाया, तब आसमान में ग्यारह रूद्र और चक्र, गदा, त्रिशूल ऐसे लाखो प्रकार के शस्र भी प्रकट हुए थे. पांडवसेना के जिसी भी वीर ने प्रतिकार करने की कोशिश की वो नष्ट हो गया. तब भगवान् कृष्ण ने पांडवसेना को नारायण अस्र के आगे समर्पण करने को कहा. भगवन कृष्ण की बात मानकर सभी ने ऐसा किया भी, पर भीम ऐसा करना कायरता समझते थे, वे काफी समय तक लढते रहे पर नारायणअस्र के सामने उनकी एक न चली और वे बुरी तरह से थक गए, आखिर पांडवो के समझाने पर उन्होंने भी समर्पण कर दिया था.

नारायण-अस्त्र (Narayanastra) का रहस्य

नारायणअस्र को सत्ययुग में भगवान नारायण ने इजाद किया गया था, सत्ययुग वो युग था, जहा सत्य और धर्म को सबसे अधिक महत्त्व था और सत्य और धर्म सबसे प्रभावशील थे. सत्ययुगीन युद्ध नियमो के अनुसार कभी किसी निहत्ये या समर्पित पर प्रहार नहीं किया जा सकता था, और उन्ही नियमो के अनुसार अगर कोई सेना समर्पण कर देती हे तो वो युद्ध का अंत होता था क्योकि सत्ययुग के अनुसार वो समर्पण योद्धा को होता था न की अस्र को. यानि अगर योद्धा समर्पण कर दे तो वो युद्ध का अंत होता था. और इसी कारन फिर भी अगर योद्धा इस अस्र का दुबारा उपयोग करे तो वो यक़ीनन धर्म का आचरण नहीं कर रहा होता था, और उसका उद्देश समर्पित सेना का संहार करना होता था, इस कारन ये अस्र दोबारा उपयोग करने वाले योद्धा और उसकी सेना को नष्ट कर देता था.

  द्वापर युग में सत्य और धर्म उतना प्रभावी नहीं रहा था, जितना की वो सत्ययुग या त्रेतायुग में था और इसी के चलते युद्धनियमो काफी परिवर्तन भी हो गए थे, और इन्ही Loopholes का महाभारत युद्ध में दोनों छोर से काफी बार उपयोग किया गया था नारायणास्त्र के सामने समर्पण, और इस अस्त्र के निरस्त्र होने के बाद फिर से युद्ध का आरंभ इनमेसे एक था. कुरु वीर अश्वथामाके पास बहोतसे दैवी अस्र जैसे नारायणअस्र, ब्रह्म-शिर-अस्र और तो और ब्रह्मास्र तकथा. पुरानो के अनुसार वो आज भी जिन्दा हे, और कई लोग ये दावा भी करते हे की, हिमालय के दूर दराज जंगलो में उन्होंने अश्वथामा को देखा हे. प्रश्न ये हे की अगर अश्वथामा जिन्दा हे तो … क्या ये सभी दैवी अस्र आज भी उसके साथ हे??? आप क्या सोचते हे इस बारे में कमेन्ट करे, साथ ही बताये कैसा लगा हमारा लेख नारायणअस्त्र (Narayanastra) – भगवान नारायण का दैवी अस्त्र

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