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बलुचिस्तान के मराठे – अनसुनी कहाणी भारत के अजेय योद्धाओ कि..

बलुचिस्तान के मराठे- अनसुनी कहाणी भारत के अजेय योद्धाओ कि 

बलुचिस्तान के मराठे – अनसुनी कहाणी भारत के अजेय योद्धाओ कि!  बलूचिस्तान हमारे पडोसी पाकिस्तान का एक राज्य अपने separetist movement की वजह से हाल में काफी चर्चा में था. पर क्या आप ये जानते हे की बलूचिस्तान के बहोतसे बलूची निवासीयो के पूर्वज भारत के राज्य महाराष्ट्र के निवासी थे. और आज भी बहोतसारे बलूची अपने को गर्व से मराठा कहते हे. नमस्कार मित्रो स्वागत हे आपका मिथक टीवी Articles में… आज के Articles में हम बात करेंगे बलूचिस्तान के मराठाओ की…. कहानी की शुरवात होती हे आज से लगभग २५० साल पहले   साल था १७६१, हरियाणा के पानीपत शहर के नजदिन सदाशिवरावभाऊ के नेतृत्व में मराठा सेना और अहमदशाह अब्दाली के नेतृत्व में अफगान सेना एकदुसरे के सामने थी. पिछले १०० सालो में भारत का राजकीय नक्षा काफी बदल चूका था, कभी मुघलो के अधीन रहने वाला भारत आज हिन्दू मराठाओ के घोड़ो की टापोतले अपने सुवर्ण अतीत को फिरसे महसूस कर रहा था.

Panipat third battle

गंगा-यमुना के दोआब में रहनेवाला नाजिबखान नाम के एक मामूली रोहिला पठान जिसे कभी मराठा सरदार मल्हारराव होलकर अपना मानसपुत्र कहकर पेशवा की तलवार से मरने से बचाया था. इस मामूली सरदार ने जिहाद का वास्ता देकर मराठो के खिलाफ अफगान सुलतान अहमदशाह अब्दाली को लाखो की सेना खडी कर दी थी.

पानिपत का तिसरा युद्ध (Third Panipat Battle)

तारीख थी, १४ जनवरी १७६१, जब अफगान और मराठो के बिच युद्ध शुरू हुवा… मराठो की तलवार ने अपना रंग दिखाना शुरू किया था…. अफगान काटे जा रहे थे, मारे जा रहे थे, भाग रहे थे,… युद्ध का नतीजा लगभग तय हो चूका था …. आज पानीपत का वो युद्धस्थल अपना इतिहास बदलने वाला था और विजय की माला किसी भारतीय सेना के गले पड़ने वाली थी पर, शायद नियति को ये मंजूर नहीं था, पेशवा नानासाहब के बेटे विश्वासराव युद्ध की हड़बड़ी में अचानक कही गायब होगये…. अपने भतीजे को कही न देखकर सदाशिवभाऊ गुस्से में, पागलो की तरह अपने घोड़े से उतारकर अफगानों को काटने लगे.

  मराठो को अपने दोनों नेता कही दिखाई नहीं देने की वजह से घबरा गए और वे युद्ध छोड़ कर भागने लगे, जीता हुवा युद्ध मराठे हार गये.

रघुनाथराव से डरकर भागने वाले अब्दाली ने, रघुनाथराव से कई गुना होशियार और सामर्थ्यशाली सदाशिवभाऊ को हराकर इतिहास रचा था

  (मराठो की हार के असली कारन कुछ और ही थे, इस बारे मे जाणणे के लिये जरूर पढे -पानीपत के युद्ध की बात हम और कभी करेंगे … )  

Bugati Maratha

महाराष्ट्र से बलुचिस्तान (Maharashtra to Balochistan)

अफगान ग्रन्थ सियार उल मुत्ताखिरिन के अनुसार,अब्दाली ने २२,००० मराठो को युद्धकैदी बना लिया था, जिन्हें लेकर वो बलूचिस्तान के डेरा-बुगटी तक गया, कलात खानाते के शासक नासिर खान नूरी ने ठीक युद्ध के समय अब्दाली को अपनी सेना की मदत भेजी थी, इसी का कर्ज चुकाने के लिए अब्दाली ने सारे युद्ध कैदी उन्हें दे दिए. एक नासिर खान नूरी ने इन कैदियों को अपने राज्य के कबीलों में बाट दिया,   जिनमे बुगटी, मरी, मझार, रायसानी, गुर्चानी शामिल थे. इनमे से बुगटी मराठा आज बाकि बलूचियो से काफी प्रगत हे और ये बलूचिस्तान में बड़े बड़े पदोंतक पुहच चुके हे. शुरवात में बुगटी कबिले ने इन सभी को गुलाम बनाकर रखा गया था, पर बादमे इन्हें कुछ अपवाद छोड़ दे तो अपने आप में समेत लिया गया

Maharashtra Balochistan Connection

  एक और बलूच मराठा जाती हे, जो तत्कालीन छत्रपति शाहू के नाम को धारण करती हे. साहू मराठा (शाहू) ये उन मराठो मेंसे हे जिन्हें कभी गुलाम नहीं बनाया गया था, बलूचीओ को खेती करना मालूम नहीं था, साहू मराठो को पानी के करीब बसाया गया और खेती करने के लिए जमीने दी गयी. शाहू मराठो में गढ़वानी, रंगवानी, पेशवानी, किलवानी ये उपजातीया हे जो शायद उनके महाराष्ट्र में उनके काम से सम्बंधित हे, गढ़वानी जो छोटे गढो के रक्षक थे, किल्वानी जो किलो की सुरक्षा करते थे, रंगवानी रंगमहलो की रक्षा तो पेशवानी जो पेशवा की personal सेना में शामिल थे.   तीसरी एक बलूच मराठा जाती हे जिन्हें बाकियों के मुकाबले काफी सम्मान और इज्जत मिली थी, दरुराग मराठा, ये वो मराठा थे जिनके वंशज सरदार थे, और बलूचिस्तान में इन्हें काफी सम्मान दिया गया था, आज भी इनमे से बहुत बड़े बड़े जमीदार हे. 

Maratha Of Balochistan

डेरा बुगती गाव की कुल २०,००० जनसँख्या में से ७००० मराठा हे, तो सुई शहर में ८००० मराठा हे आज भी २५० सालो के बाद भी ये मराठे अपनी सभ्यता को भूले नहीं हे, ये अपनी माँ को “आई” कहकर ही बुलाते हे, कमोल, गोदी, सुबद्रा ऐसे नाम स्रियो में काफी आम हे. जैसे महाराष्ट्र में सुनील को जैसे शोर्ट में सुन्या कहकर बुलाते हे उसी तरह ये बलूची भी कासिम को काश्या कहकर बुलाते हे. शादी और हल्दी की रसम, सभी में उन्होंने आज भी मराठी परंपरा को जीवित रखा हे आपको हमारा ये Article कैसा लगा हमे कमेन्ट कर बताये,(हमारे युट्यूब विडीयो पर काफी बलुची मराठा भाईयो ने कमेंट कर हमसे अपनी भावनाये share कि हे)

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