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क्या कर्ण राक्षसपुत्र था? Karna Previous Birth Story

क्या आपको पता हे ? कर्ण राक्षसपुत्र था

नमस्कार मित्रो स्वागत हे आपका मिथक टीवी ब्लॉग में में, महापराक्रमी कर्ण के बारे में, सभी लोग जानते हे और कर्ण के दुःख को जानकार वे काफी व्यथित भी होते हे. आज हम आपको दानवीर कर्ण की एक ऐसी कहानी सुनायेंगे जो शायद ही आपने कभी सुनी हो.

कर्ण के पूर्वजन्मके बारे मे दो कहानिया प्रचलित हे, इनमेसे ये कहाणी दक्षिण भारतीय लोककथाओ से निकालकर सामने आई हे. तो दुसरी कहाणी जल्द ही हम आपको बतायेंगे

कर्ण पूर्वजन्म कहाणी / Karna Previous Birth Story (Dambodbhava Story) 

  त्रेता युग में कुछ कहानियों के तार कर्ण से आ कर जुड़ते हैं (Karna Previous Birth) ।कहानी एक असुर से शुरू होती हे – जिसका नाम था दम्बोद्भव (dambodbhava) । उसने सूर्यदेव की बड़ी तपस्या की । सूर्य देव जब प्रसन्न हो कर प्रकट हुए और वरदान मांगने को कहा तो उसने “अमरत्व” का वरदान माँगा । सूर्यदेव ने कहा यह संभव नहीं है। तब उसने माँगा कि “मुझे एक हज़ार दिव्य कवचों की सुरक्षा मिले, और इनमे से एक भी कवच सिर्फ वही तोड़ सके जिसने एक हज़ार वर्ष तपस्या की हो” और “जैसे ही कोई कवच को तोड़े, वो तुरंत मृत्यु को प्राप्त हो जाये” ।

सूर्यदेवता बड़े चिंता में पड गए, क्यों की वे जानते थे कि यह असुर इस वरदान का दुरपयोग करेगा, पर उसकी तपस्या के आगे वे वर देने के लिए मजबूर थे और उन्हे उसे यह वरदान देना ही पडा । वर प्राप्त होने के बाद जैसा की हर असुर करता हे, दम्बोद्भव(Dambodbhava) भी सहस्र कवचों के कारन अपने आप को अमर समझाने लगा और लोगो पर अत्याचार करने लगा । दुनिया उसे “सहस्र कवच (Sahastra Kavacha)” नाम से जाना जानने लगी।

उसी समय वर्तमान अफगानिस्तान में दक्ष(Daksha) प्रजापति राज कर रहे थे, दक्ष अपनी पुत्री “मूर्ति” का विवाह ब्रह्मा जी के मानस पुत्र “धर्म” से किया । मूर्ति ने सहस्र्कवच के बारे में सुना हुआ था और मन ही मन घबरायी हुयी थी …. इसीकारण उन्होंने श्री विष्णु से प्रार्थना की कि वे सहस्रकवच को ख़त्म करने के लिए वे पृथ्वी पर अवतार ले । विष्णु जी ने उसे आश्वासन दिया कि वे ऐसा जरुर करेंगे।

समय के चलते मूर्ति ने दो जुडवा पुत्रों को जन्म दिया जिनके नाम थे नर और नारायण । दोनों दो शरीरों में होते हुए भी एक थे – जैसे की दो शरीर एक आत्मा । भगवान विष्णु ने एक साथ दो शरीरों में नर और नारायण के रूप में अवतार लिया था । एक बार दम्बोध्भव उस वन पर आक्रमण कर देता हे जहा वे रहते थे । तब उसने एक तेजस्वी मनुष्य को अपनी ओर आते देखा और अन्दर ही अन्दर भय का अनुभव किया ।

भय होते भी दम्बोद्भव(Dambodbhava) ने हंस कर कहा – तुम क्यों मृत्यु को गले लगाना चाहते हो ? मेरा कवच सिर्फ वही तोड़ सकता है जिसने हज़ार वर्षों तक तप किया हो । नर ने हँस कर कहा कि मैं और मेरा भाई नारायण में एक ही आत्मा वास करती हैं – वह मेरे बदले तप कर रहे हैं, और मैं उनके बदले युद्ध कर रहा हूँ ।

युद्ध शुरू हुआ, सहस्र कवच को आश्चर्य होता रहा कि सच ही में नारायण के तप से नर की शक्ति बढती चली जा रही थी । जैसे ही हज़ार वर्ष का समय पूर्ण हुआ, नर ने सहस्रकवच का एक कवच तोड़ दिया । लेकिन सूर्य के वरदान के अनुसार जैसे ही कवच टूटा नर मृत हो कर वहीँ गिर पड़े । सहस्र कवच ने सोचा, कि चलो एक कवच गया पर ये तो मर गया, अब डरने की कोई बात नहीं हे । तभी उसने देखा की नर उसकी और दौड़े आ रहा है – और वह चकित हो गया । पल भर पहले ही तो उसके सामने नर की मृत्यु हुई थी और अभी ये जीवित होकर मेरी और कैसे दौड़ा आ रहा है ??? लेकिन फिर उसने देखा कि नर तो मृत पड़े हुए थे, और ये तो हुबहु नर जैसे प्रतीत होते उनके भाई नारायण थे – जो उसकी और नहीं, बल्कि अपने भाई नर की और दौड़ रहे थे । दम्बोद्भव ने अट्टहास करते हुए नारायण से कहा कि तुम्हे अपने भाई को समझाना चाहिए था – इसने अपने प्राण व्यर्थ ही गँवा दिए ।


नारायण शांतिपूर्वक मुस्कुराए और उन्होंने नर के पास बैठ कर कोई मन्त्र पढ़ा और चमत्कारिक रूप से नर उठ बैठे । तब दम्बोद्भव की समझ में आया कि हज़ार वर्ष तक शिवजी की तपस्या करने से नारायण को मृत्युंजय मन्त्र की सिद्धि हुई है – जिससे उन्होंने अपने भाई को पुनर्जीवित किया हे । अब इस बार नारायण ने दम्बोद्भव को ललकारा और नर तपस्या में बैठे । हज़ार साल के युद्ध और तपस्या के बाद फिर एक बार कवच टूटा और नारायण की मृत्यु हो गयी । फिर नर ने आकर नारायण को पुनर्जीवित कर दिया, और यह चक्र फिर फिर चलता रहा ।इस तरह ९९९ बार युद्ध हुआ । एक भाई युद्ध करता दूसरा तपस्या । हर बार पहले की मृत्यु पर दूसरा उसे पुनर्जीवित कर देता । जब 999 कवच टूट गए तो सहस्र्कवच समझ गया कि अब मेरी मृत्यु हो जायेगी और वो युद्ध त्याग कर सूर्यलोक भाग कर सूर्यदेव के शरण में गया ।

नर और नारायण उसका पीछा करते सूर्यलोक गये और सूर्यदेव को उसे सौंपने को कहा पर सूर्यदेव अपने भक्त को सौंपने पर राजी न हुए. तब नारायण ने अपने कमंडल से जल लेकर सूर्यदेव को श्राप दिया कि आप इस असुर को उसके कर्म के फल से बचाने का प्रयास कर रहे हैं,  जिस कारन आप भी इसके पापों में भागीदार हुए और आप को भी इसके साथ पृथ्वी पर जन्म लेकर फल भोगना होगा ।

समय बाद माता कुंती ने अपने वरदान को जांचते हुए सूर्यदेव का आवाहन किया, और कर्ण का जन्म हुआ । लेकिन यह बात आम तौर पर ज्ञात नहीं है,  कि  कर्ण सिर्फ सूर्यपुत्र ही नहीं है, बल्कि उसके भीतर सूर्य और दम्बोद्भव दोनों हैं । जैसे नर और नारायण में दो शरीरों में एक आत्मा थी, उसी तरह कर्ण(Karna) के एक शरीर में दो अंशो का वास है – सूर्य और सहस्रकवच(Sahastra Kavacha) । दूसरी ओर नर और नारायण इस बार अर्जुन और कृष्ण के रूप में जन्म लेते हे।

कर्ण(Karna) के भीतर जो सूर्य का अंश है, जो उसे तेजस्वी वीर बनाता है और सहस्रकवच के बछे उस अकेले कवच के साथ उसका जन्म होता हे और उसके भीतर दम्बोद्भव का अंश होने से उसके कर्मफल से उसे अनेक अन्याय और अपमान मिलते है,  और उसे द्रौपदी का अपमान और ऐसे ही अनेक अपकर्म करने को प्रेरित करता है. महाभारत का युद्ध हजार सालो तक न चले इसी कारन इंद्र कर्ण से कवच लेते हे. इसी एपिसोड को आप बड़े ही मनोरंजक तरीके से देख भी सकते हे. 

Mythak

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